अफीम खेती केस में पूर्व भाजपा नेता विनायक ताम्रकार को हाईकोर्ट से राहत
करीब छह महीने बाद मिली जमानत, 939 पन्नों की चार्जशीट के बाद अब 9 सितंबर से ट्रायल
दुर्ग। जिले के बहुचर्चित समोदा अफीम खेती मामले में पूर्व भाजपा नेता विनायक ताम्रकार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका मंजूर कर दी है। ताम्रकार 7 मार्च 2026 से न्यायिक हिरासत में थे।
मामला 6 मार्च 2026 को सामने आया था, जब पुलिस और अन्य विभागों की संयुक्त टीम ने समोदा क्षेत्र में कथित अवैध अफीम की खेती का खुलासा किया था। इसके बाद यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी काफी चर्चा में रहा। विधानसभा में भी इसे लेकर हंगामा हुआ था।
जमानत के पीछे कोर्ट के प्रमुख आधार
हाईकोर्ट के आदेश में सामने आए तथ्यों के अनुसार, जिस स्थान पर कथित अफीम की खेती मिली, वहां ताम्रकार कार्रवाई के दौरान मौजूद नहीं थे। उनके व्यक्तिगत एवं विशिष्ट कब्जे से कोई मादक पदार्थ बरामद होने की बात भी रिकॉर्ड में नहीं थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जांच पूरी हो चुकी है और 29 जुलाई 2026 को चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।
कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात भी कही कि सिर्फ पानी, बिजली, पंप या स्प्रिंकलर जैसी कृषि सुविधाओं की मौजूदगी को जानबूझकर अवैध अफीम खेती में भागीदारी या सचेत कब्जे का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
939 पन्नों की चार्जशीट, 79 गवाह
पुलिस ने मामले में 939 पन्नों की चार्जशीट न्यायालय में पेश की है। रिपोर्टों के अनुसार मामले में पुलिसकर्मियों सहित 79 गवाह बनाए गए हैं। अब मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ते हुए 9 सितंबर 2026 से ट्रायल शुरू होने की जानकारी है।
ताम्रकार के पक्ष में उभरता कानूनी पहलू
विनायक ताम्रकार की ओर से देखा जाए तो मामले में उनके पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथित अफीम की खेती वाली जमीन पर उनका प्रत्यक्ष कब्जा और मौके पर उनकी मौजूदगी स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं बताई गई है। इसके अलावा उनके व्यक्तिगत कब्जे से मादक पदार्थ की बरामदगी भी नहीं हुई। हाईकोर्ट ने भी माना कि केवल पानी, बिजली, पंप अथवा स्प्रिंकलर जैसी साझा कृषि सुविधाओं का होना किसी व्यक्ति की जानबूझकर अफीम खेती में संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में ताम्रकार को मिली जमानत को उनके पक्ष में आए महत्वपूर्ण न्यायिक राहत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम रूप से आरोपों की सत्यता का निर्णय ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।
अब निगाहें ट्रायल पर
हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जमानत का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। अब ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपियों की कथित भूमिका क्या थी और उपलब्ध साक्ष्य किस हद तक आरोपों को सिद्ध करते हैं। दूसरी ओर बचाव पक्ष इन्हीं साक्ष्यों को चुनौती देगा।
समोदा अफीम कांड में हाईकोर्ट की जमानत ने फिलहाल विनायक ताम्रकार को राहत जरूर दी है, लेकिन मामले की असली तस्वीर अब ट्रायल में सामने आने वाली गवाही और साक्ष्यों से स्पष्ट होगी।

