वाशिंगटन। अमेरिका में आयात शुल्क (टैरिफ) को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए टैरिफ के खिलाफ 25 राज्यों ने एकजुट होकर संघीय अदालत का दरवाजा खटखटाया है। राज्यों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले अवैध ठहराई जा चुकी टैरिफ नीति को प्रशासन अब दूसरे कानूनी प्रावधानों के जरिए दोबारा लागू करने की कोशिश कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई रणनीति
इस वर्ष फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA), 1977 के तहत राष्ट्रपति को व्यापक स्तर पर आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। अदालत के इस फैसले के बाद सरकार को कई आयातकों से वसूला गया शुल्क वापस करना पड़ा था।
अब ट्रंप प्रशासन ने ट्रेड एक्ट, 1974 की धारा 301 (Section 301) के तहत नई टैरिफ नीति लागू की है। इसी प्रावधान के आधार पर पहले कार्यकाल में चीन पर भी भारी आयात शुल्क लगाया गया था।
59 देशों और यूरोपीय संघ पर नया टैरिफ
नई नीति के तहत अमेरिका ने 59 देशों और यूरोपीय संघ से आयात होने वाले उत्पादों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक का नया शुल्क लागू किया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह कदम उन देशों के खिलाफ उठाया गया है जो जबरन श्रम (Forced Labor) से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी रोक लगाने में विफल रहे हैं।
राज्यों ने बताया कानून की भावना के खिलाफ
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने ट्रंप प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में हार के बावजूद सरकार नए कानूनी रास्ते अपनाकर वही नीति लागू करना चाहती है। उनका कहना है कि इससे अमेरिकी परिवारों और कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा और महंगाई बढ़ सकती है।
याचिकाकर्ता राज्यों का भी आरोप है कि प्रशासन केवल कानूनी आधार बदलकर पहले की अवैध नीति को नए स्वरूप में लागू करने का प्रयास कर रहा है, जिससे उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों की लागत बढ़ेगी।
व्हाइट हाउस ने किया बचाव
व्हाइट हाउस ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग कर रहा है। प्रशासन का तर्क है कि अनुचित व्यापारिक नीतियों और जबरन श्रम से बने उत्पादों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों के हित में है।
अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कानूनी लड़ाई लंबी चली तो अमेरिकी व्यापारिक माहौल में अनिश्चितता बढ़ सकती है और आयात-निर्यात से जुड़े उद्योगों की लागत पर असर पड़ेगा। वहीं, ट्रंप समर्थकों का कहना है कि सख्त टैरिफ नीति से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
अमेरिका में व्यापार नीति पहले से ही एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनी हुई है। ऐसे में इस मामले पर अदालत का फैसला ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति और भविष्य की व्यापार नीति के लिए अहम साबित हो सकता है।

