नई दिल्ली: महिला आरक्षण बिल और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को लेकर सरकार ने अभी सभी रास्ते बंद नहीं किए हैं। बीते मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे के कारण संसद में अपेक्षित कामकाज नहीं हो सका और 13 अगस्त को लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित यानी Sine Die कर दी गई। हालांकि, इसके बाद भी संसद के मानसून सत्र का औपचारिक Prorogation (सत्रावसान) नहीं हुआ है। यही वजह है कि इन दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
Sine Die के बाद भी नहीं हुआ सत्रावसान
लोकसभा अध्यक्ष ने 13 अगस्त को सदन की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की घोषणा की थी। इसके बाद 23 अगस्त तक राष्ट्रपति की ओर से मानसून सत्र के सत्रावसान की घोषणा नहीं की गई। आमतौर पर सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद कुछ समय में पूरे सत्र को भी Prorogue कर दिया जाता है।
हालांकि, इस बार Sine Die और Prorogue के बीच अंतर बना हुआ है। इसी तकनीकी स्थिति को देखते हुए राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार अभी भी महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर विकल्प खुले रखना चाहती है।
Sine Die और Prorogue में क्या है अंतर?
Sine Die का अर्थ है सदन की बैठक को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना। इसमें अगली बैठक की तारीख तय नहीं होती, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि संसदीय सत्र पूरी तरह समाप्त हो गया।
वहीं Prorogue का अर्थ पूरे संसदीय सत्र का औपचारिक रूप से समापन है। सत्रावसान राष्ट्रपति करते हैं और इसके लिए केंद्र सरकार की सलाह आवश्यक होती है।
आसान भाषा में कहें तो Sine Die सदन की बैठक रोकता है, जबकि Prorogue पूरे सत्र को समाप्त करता है।
क्या विधेयकों को इसी वजह से मिल सकता है मौका?
यही इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। मानसून सत्र का अभी तक सत्रावसान नहीं होने के कारण यह संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है कि सरकार जरूरत पड़ने पर इसी संसदीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि, सिर्फ Prorogue नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि महिला आरक्षण या परिसीमन विधेयक निश्चित रूप से संसद में पेश किए जाएंगे। दोनों मामलों में संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी और ऐसे विधेयकों को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित कराना होगा। इसलिए सरकार के लिए पर्याप्त संख्या बल जुटाना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
2029 के चुनाव को लेकर क्यों अहम है मामला?
महिला आरक्षण से जुड़ा संवैधानिक प्रावधान परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि सरकार इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से प्रभावी बनाना चाहती है, तो समयसीमा महत्वपूर्ण हो जाती है।
पहले ऐसी चर्चाएं थीं कि सरकार ने दोनों विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन जुटा लिया है। लेकिन मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे के कारण कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी।
जयराम रमेश ने उठाए सवाल
लोकसभा के सत्रावसान में देरी को लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि लोकसभा को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के 10 दिन बाद भी सत्रावसान नहीं हुआ है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि क्या केंद्रीय गृह मंत्री विशेष सत्र बुलाकर विधेयक पारित कराने के लिए संख्या जुटाने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, ये कांग्रेस नेता द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवाल हैं। सरकार की ओर से अभी तक सत्रावसान में देरी को लेकर ऐसी कोई आधिकारिक वजह सामने नहीं आई है।
पहली बार नहीं हुई ऐसी देरी
Sine Die और Prorogue के बीच कई दिनों का अंतर होना पूरी तरह अभूतपूर्व नहीं है। जयराम रमेश ने भी बताया है कि 2015 के मानसून सत्र में यह अंतर 28 दिन का था। वहीं 2021 में 20 दिन का अंतर रहा था।
इसलिए केवल सत्रावसान में देरी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सरकार निश्चित रूप से महिला आरक्षण या परिसीमन विधेयक लाने की तैयारी कर रही है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में इस देरी ने इन दोनों विधेयकों को लेकर अटकलों को जरूर तेज कर दिया है।
फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि लोकसभा की कार्यवाही भले ही 13 अगस्त को Sine Die हो चुकी है, लेकिन मानसून सत्र का Prorogation नहीं हुआ है। ऐसे में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर राजनीतिक संभावनाओं का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं माना जा रहा है।

