बांग्लादेश में नई सरकार, भारत के लिए नई चुनौती; कूटनीति से लेकर पूर्वोत्तर सुरक्षा तक बढ़ी चिंता

नई दिल्ली, 20 अगस्त 2026: पड़ोसी बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के बाद भारत के सामने अब रिश्तों को नए सिरे से मजबूत करने की चुनौती है। ढाका की सत्ता में हुए परिवर्तन का असर सिर्फ दोनों देशों के राजनयिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद भारत को नई सरकार के साथ संतुलित संबंध बनाने की जरूरत महसूस हो रही है।

1971 से जुड़े हैं दोनों देशों के रिश्ते

भारत और बांग्लादेश के संबंधों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ी है। हालांकि समय-समय पर अवैध प्रवास, सीमा विवाद, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के बीच चुनौतियां भी खड़ी की हैं।

शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूती मिली। बांग्लादेश ने अपनी धरती पर सक्रिय भारत विरोधी उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की, जिसका सकारात्मक असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा स्थिति पर पड़ा।

भूमि सीमा समझौते से मजबूत हुआ भरोसा

भारत-बांग्लादेश संबंधों में 2015 का भूमि सीमा समझौता अहम पड़ाव माना जाता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान हुआ। लंबे समय से चले आ रहे सीमा संबंधी इस विवाद के समाधान ने आपसी विश्वास बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कनेक्टिविटी से पूर्वोत्तर को फायदा

दोनों देशों के बीच परिवहन और संपर्क सुविधाओं का विस्तार भी भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक शुरू किया गया। करीब 12.24 किलोमीटर लंबे इस रेल मार्ग से पूर्वोत्तर भारत को बांग्लादेश के रास्ते क्षेत्रीय बाजारों से जोड़ने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।

रेल, सड़क, जलमार्ग और बंदरगाहों के बेहतर इस्तेमाल से पूर्वोत्तर भारत के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे परिवहन लागत और समय घटने के साथ व्यापार को भी गति मिलने की उम्मीद है।

सुरक्षा के लिहाज से बांग्लादेश अहम

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा के लिए बांग्लादेश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। अतीत में कई उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया था। दोनों देशों के बीच बढ़े सुरक्षा सहयोग और कार्रवाई के बाद इस चुनौती को काफी हद तक कमजोर किया गया।

यही वजह है कि नई दिल्ली के लिए ढाका में राजनीतिक स्थिरता और सहयोग बनाए रखना रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है।

व्यापार और आर्थिक सहयोग भी दांव पर

पिछले डेढ़ दशक में भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक रिश्तों का भी विस्तार हुआ है। भारत ने बुनियादी ढांचे से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स के लिए बांग्लादेश को रियायती ऋण उपलब्ध कराया। बिजली, रेलवे, सड़क, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को करीब लाने में भूमिका निभाई।

लेकिन वर्ष 2024 के बाद बांग्लादेश की राजनीति में हुए बदलाव ने समीकरण बदल दिए। शेख हसीना के भारत आने और इसके बाद राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजरने के बाद नई दिल्ली को अब नई सरकार के साथ संबंधों की दिशा तय करनी है।

हसीना का प्रत्यर्पण बना संवेदनशील मुद्दा

शेख हसीना का भारत में रहना दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। बांग्लादेश की ओर से उनके प्रत्यर्पण की मांग की जा चुकी है। भारत ने इस मामले पर कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया के तहत विचार किए जाने की बात कही है। ऐसे में यह मुद्दा दोनों देशों के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

चीन के बढ़ते प्रभाव पर भी भारत की नजर

बांग्लादेश में चीन समेत अन्य बाहरी शक्तियों की सक्रियता के बीच भारत के लिए अपनी रणनीति को और मजबूत करना जरूरी हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली को राजनीतिक बदलावों से इतर आर्थिक सहयोग, कनेक्टिविटी और सुरक्षा साझेदारी को प्राथमिकता देनी होगी।

राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में भारत के लिए टकराव की जगह संतुलित कूटनीति अधिक प्रभावी विकल्प हो सकती है। सुरक्षा सहयोग जारी रखने के साथ नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करना जरूरी होगा।

व्यक्ति नहीं, संस्थागत रिश्तों पर जोर जरूरी

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दोनों देशों के संबंध किसी एक राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित न रहें। पूर्वोत्तर की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे साझा हितों को केंद्र में रखकर दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करना भारत के लिए अहम होगा।

बांग्लादेश की स्थिरता का असर सीधे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर पड़ता है। ऐसे में नई दिल्ली के लिए बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन साधते हुए पड़ोसी देश के साथ मजबूत और दीर्घकालिक संबंध बनाए रखना आने वाले समय की बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी।

nikettamrakar
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