नई दिल्ली। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और बकाया विवादों के त्वरित समाधान के उद्देश्य से एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 सोमवार को राज्यसभा से पारित हो गया। नए कानून के लागू होने के बाद सभी केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) के लिए MSME का बकाया भुगतान ट्रेड रिसिवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) के माध्यम से करना अनिवार्य होगा।
TReDS एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है, जहां MSME अपने बकाया बिल अपलोड कर बैंक या अन्य वित्तीय संस्थानों से तत्काल भुगतान प्राप्त कर सकेंगे। बाद में संबंधित बैंक या वित्तीय संस्थान सरकारी कंपनियों से मूल राशि के साथ ब्याज वसूलेंगे। अब तक यह व्यवस्था वैकल्पिक थी, लेकिन संशोधन के बाद इसे अनिवार्य बना दिया जाएगा। राज्य सरकारों को भी अपनी सार्वजनिक कंपनियों के लिए इस मॉडल को अपनाने का विकल्प दिया गया है।
राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय MSME मंत्री जीतन राम मांझी ने बताया कि वर्ष 2014-15 में MSME क्षेत्र का बकाया करीब 10 लाख करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 38 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। उन्होंने कहा कि भुगतान में देरी से छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन और नए ऑर्डर पर भी असर पड़ता है।
संशोधित कानून के तहत MSME अब खरीदारों के खिलाफ डिजिटल माध्यम से शिकायत दर्ज कर सकेंगे और मामलों की ऑनलाइन सुनवाई होगी। इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और पोर्टल विकसित किए जाएंगे, जिससे विवादों का निपटारा पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो सकेगा।
विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी मामले के निपटान में छह महीने से अधिक का समय लग जाता है, तो अदालत अंतिम फैसला आने से पहले खरीदार को MSME के बकाया का 50 प्रतिशत भुगतान करने का निर्देश दे सकती है।
इसके अलावा, भुगतान में देरी से जुड़े मामलों का समाधान अब डिजिटल मध्यस्थता (Digital Mediation) के जरिए भी किया जा सकेगा। वर्तमान नियमों के अनुसार खरीदार को MSME का भुगतान 45 दिनों के भीतर करना होता है। निर्धारित समयसीमा के बाद बकाया राशि पर ब्याज देना अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में कई मामलों में भुगतान लंबे समय तक लंबित रहता है। नए संशोधन से ऐसी समस्याओं के समाधान में तेजी आने और MSME क्षेत्र को वित्तीय राहत मिलने की उम्मीद है।

